श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अर्वाक्स्रोतस्तु नवमः क्षत्तरेकविधो नृणाम्।

रजोऽधिकाः कर्मपरा दुःखे च सुखमानिनः॥ २५

arvāksrotastu navamaḥ kṣattarekavidho nṛṇām|

rajo'dhikāḥ karmaparā duḥkhe ca sukhamāninaḥ|| 25

अर्थ

विदुरजी! नवीं सृष्टि मनुष्योंकी है। यह एक ही प्रकारकी है। इसके आहारका प्रवाह ऊपर (मुँह)से नीचेकी ओर होता है। मनुष्य रजोगुणप्रधान, कर्मपरायण और दुःखरूप विषयोंमें ही सुख माननेवाले होते हैं॥ २५॥✎ 1589

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1589 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (मुँह)-से → (मुँह)से

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