॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.1.39
यमावुतस्वित्तनयौ पृथायाः
पार्थैर्वृतौ पक्ष्मभिरक्षिणीव।
रेमात उद्दाय मृधे स्वरिक्थं
परात्सुपर्णाविव वज्रिवक्त्रात्॥ ३९
yamāvutasvittanayau pṛthāyāḥ
pārthairvṛtau pakṣmabhirakṣiṇīva|
remāta uddāya mṛdhe svarikthaṃ
parātsuparṇāviva vajrivaktrāt|| 39
अर्थ
पलक जिस प्रकार नेत्रोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार कुन्तीके पुत्र युधिष्ठिरादि जिनकी सर्वदा सँभाल रखते हैं और कुन्तीने ही जिनका लालन-पालन किया है, वे माद्रीके यमज पुत्र नकुल-सहदेव कुशलसे तो हैं न? उन्होंने युद्धमें शत्रुसे अपना राज्य उसी प्रकार छीन लिया, जैसे दो गरुड़ इन्द्रके मुखसे अमृत निकाल लायें॥ ३९॥✎ 188