श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

इत्यूचिवांस्तत्र सुयोधनेन

प्रवृद्धकोपस्फुरिताधरेण।

असत्कृतः सत्स्पृहणीयशीलः

क्षत्ता सकर्णानुजसौबलेन॥ १४

ityūcivāṃstatra suyodhanena

pravṛddhakopasphuritādhareṇa|

asatkṛtaḥ satspṛhaṇīyaśīlaḥ

kṣattā sakarṇānujasaubalena|| 14

अर्थ

विदुरजीका ऐसा सुन्दर स्वभाव था कि साधुजन भी उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करते थे। किंतु उनकी यह बात सुनते ही कर्ण, दुःशासन और शकुनिके सहित दुर्योधनके होठ अत्यन्त क्रोधसे फड़कने लगे और उसने उनका तिरस्कार करते हुए कहा—‘अरे! इस कुटिल दासीपुत्रको यहाँ किसने बुलाया है? यह जिनके टुकड़े खा-खाकर जीता है, उन्हींके प्रतिकूल होकर शत्रुका काम बनाना चाहता है। इसके प्राण तो मत लो, परंतु इसे हमारे नगरसे तुरन्त बाहर निकाल दो’॥ १४-१५॥✎ 183 184 185 1584

यह अर्थ श्लोक 14–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #183 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #184 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #185 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1584 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अवधूत-वेषमें → अवधूतवेषमें

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