ब्रह्माजी! तुम अविचल समाधिके द्वारा मेरे इस सिद्धान्तमें पूर्ण निष्ठा कर लो। इससे तुम्हें कल्प-कल्पमें विविध प्रकारकी सृष्टिरचना करते रहनेपर भी कभी मोह नहीं होगा॥ ३६॥✎ 175
एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना।
भवान् कल्पविकल्पेषु न विमुह्यति कर्हिचित्॥ ३६
ब्रह्माजी! तुम अविचल समाधिके द्वारा मेरे इस सिद्धान्तमें पूर्ण निष्ठा कर लो। इससे तुम्हें कल्प-कल्पमें विविध प्रकारकी सृष्टिरचना करते रहनेपर भी कभी मोह नहीं होगा॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 226) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/9/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#175 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने