किन्तु जब यह गुणोंको क्षुब्ध करनेवाले काल और मोह उत्पन्न करनेवाली माया—इन दोनोंसे परे अपने अनन्त स्वरूपमें मोहरहित होकर रमण करने लगता है—आत्माराम हो जाता है; तब यह ‘मैं, मेरा’ का भाव छोड़कर पूर्ण उदासीन—गुणातीत हो जाता है॥ ३॥ ब्रह्माजीकी निष्कपट तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें अपने रूपका दर्शन कराया और आत्म-तत्त्वके ज्ञानके लिये उन्हें परम सत्य परमार्थ वस्तुका उपदेश किया (वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ)॥ ४॥✎ 171
यह व्याख्या श्लोक 2.9.3 से 2.9.4 तककी एक साथ है।
यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययोः।
रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम्॥ ३
किन्तु जब यह गुणोंको क्षुब्ध करनेवाले काल और मोह उत्पन्न करनेवाली माया—इन दोनोंसे परे अपने अनन्त स्वरूपमें मोहरहित होकर रमण करने लगता है—आत्माराम हो जाता है; तब यह ‘मैं, मेरा’ का भाव छोड़कर पूर्ण उदासीन—गुणातीत हो जाता है॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 222) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/9/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)