श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

वरं वरय भद्रं ते वरेशं माभिवाञ्छितम्।

ब्रह्मञ्छ्रेयः परिश्रामः पुंसो मद्दर्शनावधिः॥ २०

varaṃ varaya bhadraṃ te vareśaṃ mābhivāñchitam|

brahmañchreyaḥ pariśrāmaḥ puṃso maddarśanāvadhiḥ|| 20

अर्थ

तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वही वर मुझसे माँग लो। क्योंकि मैं मुँहमाँगी वस्तु देनेमें समर्थ हूँ। ब्रह्माजी! जीवके समस्त कल्याणकारी साधनोंका विश्राम—पर्यवसान मेरे दर्शनमें ही है॥ २०॥✎ 174

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #174 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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