श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.15

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

भृत्यप्रसादाभिमुखं दृगासवं

प्रसन्‍नहासारुणलोचनाननम् ।

किरीटिनं कुण्डलिनं चतुर्भुजं

पीताम्बरं वक्षसि लक्षितं श्रिया॥ १५

bhṛtyaprasādābhimukhaṃ dṛgāsavaṃ

prasannahāsāruṇalocanānanam |

kirīṭinaṃ kuṇḍalinaṃ caturbhujaṃ

pītāmbaraṃ vakṣasi lakṣitaṃ śriyā|| 15

अर्थ

उनका मुखकमल प्रसाद-मधुर मुसकानसे युक्त है। आँखोंमें लाल-लाल डोरियाँ हैं। बड़ी मोहक और मधुर चितवन है। ऐसा जान पड़ता है कि अभी-अभी अपने प्रेमी भक्तको अपना सर्वस्व दे देंगे। सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और कंधेपर पीताम्बर जगमगा रहे हैं। वक्षःस्थलपर एक सुनहरी रेखाके रूपमें श्रीलक्ष्मीजी विराजमान हैं और सुन्दर चार भुजाएँ हैं॥ १५॥

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