श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.13

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः

करोति मानं बहुधा विभूतिभिः।

प्रेङ्खं श्रिता या कुसुमाकरानुगै-

र्विगीयमाना प्रियकर्म गायती॥ १३

śrīryatra rūpiṇyurugāyapādayoḥ

karoti mānaṃ bahudhā vibhūtibhiḥ|

preṅkhaṃ śritā yā kusumākarānugai-

rvigīyamānā priyakarma gāyatī|| 13

अर्थ

उस वैकुण्ठलोकमें लक्ष्मीजी सुन्दर रूप धारण करके अपनी विविध विभूतियोंके द्वारा भगवान्‌के चरणकमलोंकी अनेकों प्रकारसे सेवा करती रहती हैं। कभी-कभी जब वे झूलेपर बैठकर अपने प्रियतम भगवान्‌की लीलाओंका गायन करने लगती हैं, तब उनके सौन्दर्य और सुरभिसे उन्मत्त होकर भौंरे स्वयं उन लक्ष्मीजीका गुण-गान करने लगते हैं॥ १३॥✎ 173

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #173 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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