सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षित्ने संतोंकी सभामें भगवान्की लीला-कथा सुनानेके लिये इस प्रकार प्रार्थना की, तब श्रीशुकदेवजीको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ २७॥✎ 169170
स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः।
ब्रह्मरातो भृशं प्रीतो विष्णुरातेन संसदि॥ २७
सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! जब राजा परीक्षित्ने संतोंकी सभामें भगवान्की लीला-कथा सुनानेके लिये इस प्रकार प्रार्थना की, तब श्रीशुकदेवजीको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 221) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)