भगवान् तो परम स्वतन्त्र हैं। वे अपनी मायासे किस प्रकार क्रीड़ा करते हैं और उसे छोड़कर साक्षीके समान उदासीन कैसे हो जाते हैं?॥ २३॥✎ 167168
यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया।
विसृज्य वा यथा मायामुदास्ते साक्षिवद् विभुः॥ २३
भगवान् तो परम स्वतन्त्र हैं। वे अपनी मायासे किस प्रकार क्रीड़ा करते हैं और उसे छोड़कर साक्षीके समान उदासीन कैसे हो जाते हैं?॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 221) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)