श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

योगेश्‍वरैश्‍वर्यगतिर्लिङ्गभङ्गस्तु योगिनाम्।

वेदोपवेदधर्माणामितिहासपुराणयोः ॥ २०

yogeśvaraiśvaryagatirliṅgabhaṅgastu yoginām|

vedopavedadharmāṇāmitihāsapurāṇayoḥ || 20

अर्थ

योगेश्‍वरोंको क्या-क्या ऐश्‍वर्य प्राप्त होते हैं, तथा अन्तमें उन्हें कौन-सी गति मिलती है? योगियोंका लिंगशरीर किस प्रकार भंग होता है? वेद, उपवेद, धर्मशास्त्र, इतिहास और पुराणोंका स्वरूप एवं तात्पर्य क्या है?॥ २०॥✎ 167 168

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #167 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #168 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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