॥ श्रीहरिः ॥
युगानि युगमानं च धर्मो यश्च युगे युगे।
अवतारानुचरितं यदाश्चर्यत३मं हरेः॥ १७
yugāni yugamānaṃ ca dharmo yaśca yuge yuge|
avatārānucaritaṃ yadāścaryatamaṃ hareḥ|| 17
अर्थ
युगोंके भेद, उनके परिमाण और उनके अलग-अलग धर्म तथा भगवान्के विभिन्न अवतारोंके परम आश्चर्यमय चरित्र भी बतलाइये॥ १७॥✎ 167 168
युगानि युगमानं च धर्मो यश्च युगे युगे।
अवतारानुचरितं यदाश्चर्यतमं हरेः॥ १७
युगोंके भेद, उनके परिमाण और उनके अलग-अलग धर्म तथा भगवान्के विभिन्न अवतारोंके परम आश्चर्यमय चरित्र भी बतलाइये॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 220) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/17/टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—मयं।
(मुद्रित पृष्ठ 220)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #167 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #168 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की