श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.41

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्ते

मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये।

गायन् गुणान् दशशतानन आदिदेवः

शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम्॥ ४१

nāntaṃ vidāmyahamamī munayo'grajāste

māyābalasya puruṣasya kuto'pare ye|

gāyan guṇān daśaśatānana ādidevaḥ

śeṣo'dhunāpi samavasyati nāsya pāram|| 41

अर्थ

समस्त सृष्टिकी रचना और संहार करनेवाली माया उनकी एक शक्ति है। ऐसी-ऐसी अनन्त शक्तियोंके आश्रय उनके स्वरूपको न मैं जानता हूँ और न वे तुम्हारे बड़े भाई सनकादि ही; फिर दूसरोंका तो कहना ही क्या है। आदिदेव भगवान् शेष सहस्र मुखसे उनके गुणोंका गायन करते आ रहे हैं; परन्तु वे अब भी उसके अन्तकी कल्पना नहीं कर सके॥ ४१॥✎ 158 159 160

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #158 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #159 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #160 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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