श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.37

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

देवद्विषां निगमवर्त्मनि निष्ठितानां

पूर्भिर्मयेन विहिताभिरदृश्यतूर्भिः।

लोकान् घ्नतां मतिविमोहमतिप्रलोभं

वेषं विधाय बहु भाष्यत औपधर्म्यम्॥ ३७

devadviṣāṃ nigamavartmani niṣṭhitānāṃ

pūrbhirmayena vihitābhiradṛśyatūrbhiḥ|

lokān ghnatāṃ mativimohamatipralobhaṃ

veṣaṃ vidhāya bahu bhāṣyata aupadharmyam|| 37

अर्थ

देवताओंके शत्रु दैत्यलोग भी वेदमार्गका सहारा लेकर मयदानवके बनाये हुए अदृश्य वेगवाले नगरोंमें रहकर लोगोंका सत्यानाश करने लगेंगे, तब भगवान् लोगोंकी बुद्धिमें मोह और अत्यन्त लोभ उत्पन्‍न करनेवाला वेष धारण करके बुद्धके रूपमें बहुत-से उपधर्मोंका उपदेश करेंगे॥ ३७॥✎ 157

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #157 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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