नारद! कर्दम प्रजापतिके घर देवहूतिके गर्भसे नौ बहिनोंके साथ भगवान्ने कपिलके रूपमें अवतार ग्रहण किया। उन्होंने अपनी माताको उस आत्मज्ञानका उपदेश किया, जिससे वे इसी जन्ममें अपने हृदयके सम्पूर्ण मल—तीनों गुणोंकी आसक्तिका सारा कीचड़ धोकर कपिलभगवान्के वास्तविक स्वरूपको प्राप्त हो गयीं॥ ३॥✎ 145
जज्ञे च कर्दमगृहे द्विज देवहूत्यां
स्त्रीभिः समं नवभिरात्मगतिं स्वमात्रे।
ऊचे ययाऽऽत्मशमलं गुणसङ्गपङ्क-
मस्मिन् विधूय कपिलस्य गतिं प्रपेदे॥ ३
नारद! कर्दम प्रजापतिके घर देवहूतिके गर्भसे नौ बहिनोंके साथ भगवान्ने कपिलके रूपमें अवतार ग्रहण किया। उन्होंने अपनी माताको उस आत्मज्ञानका उपदेश किया, जिससे वे इसी जन्ममें अपने हृदयके सम्पूर्ण मल—तीनों गुणोंकी आसक्तिका सारा कीचड़ धोकर कपिलभगवान्के वास्तविक स्वरूपको प्राप्त हो गयीं॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.7.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 209) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/7/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)