श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.21

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

धन्वन्तरिश्‍च भगवान् स्वयमेव कीर्ति-

र्नाम्ना नृणां पुरुरुजां रुज आशु हन्ति।

यज्ञे च भागममृतायुरवावरुन्ध२

आयुश्‍च वेदमनुशास्त्यवतीर्य लोके॥ २१

dhanvantariśca bhagavān svayameva kīrti-

rnāmnā nṛṇāṃ pururujāṃ ruja āśu hanti|

yajñe ca bhāgamamṛtāyuravāvarundha

āyuśca vedamanuśāstyavatīrya loke|| 21

अर्थ

स्वनामधन्य भगवान् धन्वन्तरि अपने नामसे ही बड़े-बड़े रोगियोंके रोग तत्काल नष्ट कर देते हैं। उन्होंने अमृत पिलाकर देवताओंको अमर कर दिया और दैत्योंके द्वारा हरण किये हुए उनके यज्ञभाग उन्हें फिरसे दिला दिये। उन्होंने ही अवतार लेकर संसारमें आयुर्वेदका प्रवर्तन किया॥ २१॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—रवाप दुःखमायुश्‍च।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 212)

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