श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.19

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तुभ्यं च नारद भृशं भगवान् विवृद्ध-

भावेन साधुपरितुष्ट उवाच योगम्।

ज्ञानं च भागवतमात्मसतत्त्वदीपं

यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव॥ १९

tubhyaṃ ca nārada bhṛśaṃ bhagavān vivṛddha-

bhāvena sādhuparituṣṭa uvāca yogam|

jñānaṃ ca bhāgavatamātmasatattvadīpaṃ

yadvāsudevaśaraṇā vidurañjasaiva|| 19

अर्थ

नारद! तुम्हारे अत्यन्त प्रेमभावसे परम प्रसन्‍न होकर हंसके रूपमें भगवान्‌ने तुम्हें योग, ज्ञान और आत्मतत्त्वको प्रकाशित करनेवाले भागवतधर्मका उपदेश किया। वह केवल भगवान्‌के शरणागत भक्तोंको ही सुगमतासे प्राप्त होता है॥ १९॥✎ 156

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #156 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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