श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.16

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रुत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेय-

श्‍चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः।

चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्मा-

द्धस्ते प्रगृह्य भगवान् कृपयोज्जहार॥ १६

śrutvā haristamaraṇārthinamaprameya-

ścakrāyudhaḥ patagarājabhujādhirūḍhaḥ|

cakreṇa nakravadanaṃ vinipāṭya tasmā-

ddhaste pragṛhya bhagavān kṛpayojjahāra|| 16

अर्थ

उसकी पुकार सुनकर अनन्तशक्ति भगवान् चक्रपाणि गरुडकी पीठपर चढ़कर वहाँ आये और अपने चक्रसे उन्होंने ग्राहका मस्तक उखाड़ डाला। इस प्रकार कृपापरवश भगवान्‌ने अपने शरणागत गजेन्द्रकी सूँड़ पकड़कर उस विपत्तिसे उसका उद्धार किया॥ १६॥✎ 153 154

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #153 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #154 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें