श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.12

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः

क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः।

विस्रंसितानुरुभये सलिले मुखान्मे

आदाय तत्र विजहार ह वेदमार्गान्॥ १२

matsyo yugāntasamaye manunopalabdhaḥ

kṣoṇīmayo nikhilajīvanikāyaketaḥ|

visraṃsitānurubhaye salile mukhānme

ādāya tatra vijahāra ha vedamārgān|| 12

अर्थ

चाक्षुष मन्वन्तरके अन्तमें भावी मनु सत्यव्रतने मत्स्यरूपमें भगवान्‌को प्राप्त किया था। उस समय पृथ्वीरूप नौकाके आश्रय होनेके कारण वे ही समस्त जीवोंके आश्रय बने। प्रलयके उस भयंकर जलमें मेरे मुखसे गिरे हुए वेदोंको लेकर वे उसीमें विहार करते रहे॥ १२॥✎ 151

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #151 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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