श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.4

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

त्वगस्य स्पर्शवायोश्‍च सर्वमेधस्य चैव हि।

रोमाण्युद्भिज्जजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः॥ ४

tvagasya sparśavāyośca sarvamedhasya caiva hi|

romāṇyudbhijjajātīnāṃ yairvā yajñastu sambhṛtaḥ|| 4

अर्थ

सारे यज्ञ, स्पर्श और वायु उनकी त्वचासे निकले हैं; उनके रोम सभी उद्भिज्ज पदार्थोंके जन्मस्थान हैं, अथवा केवल उन्हींके, जिनसे यज्ञ सम्पन्‍न होते हैं॥ ४॥

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