आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं संयच्छति४ च पाति च॥ ३८
sa eṣa ādyaḥ puruṣaḥ kalpe kalpe sṛjatyajaḥ|
ātmā''tmanyātmanā''tmānaṃ saṃyacchati ca pāti ca|| 38
अर्थ
वे अजन्मा एवं पुरुषोत्तम हैं। प्रत्येक कल्पमें वे स्वयं अपने-आपमें अपने-आपकी ही सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार कर लेते हैं॥ ३८॥
स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः।
आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं संयच्छति च पाति च॥ ३८
वे अजन्मा एवं पुरुषोत्तम हैं। प्रत्येक कल्पमें वे स्वयं अपने-आपमें अपने-आपकी ही सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार कर लेते हैं॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.6.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 207) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/6/38/