श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.18

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

पादेषु सर्वभूतानि पुंसः स्थितिपदो विदुः।

अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि२ मूर्धसु॥ १८

pādeṣu sarvabhūtāni puṃsaḥ sthitipado viduḥ|

amṛtaṃ kṣemamabhayaṃ trimūrdhno'dhāyi mūrdhasu|| 18

अर्थ

सम्पूर्ण लोक भगवान्‌के एक पादमात्र (अंशमात्र) हैं, तथा उनके अंशमात्र लोकोंमें समस्त प्राणी निवास करते हैं। भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोकके ऊपर महर्लोक है। उसके भी ऊपर जन, तप और सत्यलोकोंमें क्रमशः अमृत, क्षेम एवं अभयका नित्य निवास है॥ १८॥✎ 1992

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—वापि।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 205)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1992 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): (अशंमात्र) → (अंशमात्र)

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