श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.16

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

स्वधिष्ण्यं प्रतपन्१ प्राणो बहिश्‍च प्रतपत्यसौ।

एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान्॥ १६

svadhiṣṇyaṃ pratapan prāṇo bahiśca pratapatyasau|

evaṃ virājaṃ pratapaṃstapatyantarbahiḥ pumān|| 16

अर्थ

जैसे सूर्य अपने मण्डलको प्रकाशित करते हुए ही बाहर भी प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही पुराणपुरुष परमात्मा भी सम्पूर्ण विराट् विग्रहको प्रकाशित करते हुए ही उसके बाहर-भीतर—सर्वत्र एकरस प्रकाशित हो रहा है॥ १६॥✎ 1992

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्रातपत्प्राणो।

    (मुद्रित पृष्ठ 205)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1992 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): (अशंमात्र) → (अंशमात्र)

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