श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.6

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नाहं वेद परं ह्य२स्मिन्‍नापरं न समं विभो।

नामरूपगुणैर्भाव्यं सदसत् किञ्चिदन्यतः॥ ६

nāhaṃ veda paraṃ hyasminnāparaṃ na samaṃ vibho|

nāmarūpaguṇairbhāvyaṃ sadasat kiñcidanyataḥ|| 6

अर्थ

जगत‍्में नाम, रूप और गुणोंसे जो कुछ जाना जाता है उसमें मैं ऐसी कोई सत्, असत्, उत्तम, मध्यम या अधम वस्तु नहीं देखता जो आपके सिवा और किसीसे उत्पन्‍न हुई हो॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—तस्मि०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 199)

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