पैंरोंसे लेकर कटिपर्यन्त सातों पाताल तथा भूलोककी कल्पना की गयी है; नाभिमें भुवर्लोककी, हृदयमें स्वर्लोककी और परमात्माके वक्षःस्थलमें महर्लोककी कल्पना की गयी है॥ ३८॥✎ 139140
भूर्लोकः कल्पितः पद्भ्यां भुवर्लोकोऽस्य नाभितः।
हृदा स्वर्लोक उरसा महर्लोको महात्मनः॥ ३८
पैंरोंसे लेकर कटिपर्यन्त सातों पाताल तथा भूलोककी कल्पना की गयी है; नाभिमें भुवर्लोककी, हृदयमें स्वर्लोककी और परमात्माके वक्षःस्थलमें महर्लोककी कल्पना की गयी है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 202) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/5/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)