श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.38

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

भूर्लोकः कल्पितः पद‍्भ्यां भुवर्लोकोऽस्य नाभितः।

हृदा स्वर्लोक उरसा महर्लोको महात्मनः॥ ३८

bhūrlokaḥ kalpitaḥ padbhyāṃ bhuvarloko'sya nābhitaḥ|

hṛdā svarloka urasā maharloko mahātmanaḥ|| 38

अर्थ

पैंरोंसे लेकर कटिपर्यन्त सातों पाताल तथा भूलोककी कल्पना की गयी है; नाभिमें भुवर्लोककी, हृदयमें स्वर्लोककी और परमात्माके वक्षःस्थलमें महर्लोककी कल्पना की गयी है॥ ३८॥✎ 139 140

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #139 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #140 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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