श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.32

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यदैतेऽसङ्गता भावा भूतेन्द्रियमनोगुणाः।

यदायतननिर्माणे न शेकुर्ब्रह्मवित्तम॥ ३२

yadaite'saṅgatā bhāvā bhūtendriyamanoguṇāḥ|

yadāyatananirmāṇe na śekurbrahmavittama|| 32

अर्थ

श्रेष्ठ ब्रह्मवित्! जिस समय ये पंचभूत, इन्द्रिय, मन और सत्त्व आदि तीनों गुण परस्पर संगठित नहीं थे तब अपने रहनेके लिये भोगोंके साधनरूप शरीरकी रचना नहीं कर सके॥ ३२॥✎ 139 140

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #139 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #140 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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