श्रेष्ठ ब्रह्मवित्! जिस समय ये पंचभूत, इन्द्रिय, मन और सत्त्व आदि तीनों गुण परस्पर संगठित नहीं थे तब अपने रहनेके लिये भोगोंके साधनरूप शरीरकी रचना नहीं कर सके॥ ३२॥✎ 139140
यदैतेऽसङ्गता भावा भूतेन्द्रियमनोगुणाः।
यदायतननिर्माणे न शेकुर्ब्रह्मवित्तम॥ ३२
श्रेष्ठ ब्रह्मवित्! जिस समय ये पंचभूत, इन्द्रिय, मन और सत्त्व आदि तीनों गुण परस्पर संगठित नहीं थे तब अपने रहनेके लिये भोगोंके साधनरूप शरीरकी रचना नहीं कर सके॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 202) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/5/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)