श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.15

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः।

नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः॥ १५

nārāyaṇaparā vedā devā nārāyaṇāṅgajāḥ|

nārāyaṇaparā lokā nārāyaṇaparā makhāḥ|| 15

अर्थ

वेद नारायणके परायण हैं। देवता भी नारायणके ही अंगोंमें कल्पित हुए हैं और समस्त यज्ञ भी नारायणकी प्रसन्‍नताके लिये ही हैं तथा उनसे जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, वे भी नारायणमें ही कल्पित हैं॥ १५॥✎ 136 1581

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #136 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1581 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इच्छा-नुसार → इच्छानुसार

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