श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.11

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

येन स्वरोचिषा विश्‍वं रोचितं रोचयाम्यहम्।

यथार्कोऽग्‍निर्यथा सोमो यथर्क्षग्रहतारकाः॥ ११

yena svarociṣā viśvaṃ rocitaṃ rocayāmyaham|

yathārko'gniryathā somo yatharkṣagrahatārakāḥ|| 11

अर्थ

जैसे सूर्य, अग्‍नि, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और तारे उन्हींके प्रकाशसे प्रकाशित होकर जगत‍्में प्रकाश फैलाते हैं, वैसे ही मैं भी उन्हीं स्वयंप्रकाश भगवान्‌के चिन्मय प्रकाशसे प्रकाशित होकर संसारको प्रकाशित कर रहा हूँ॥ ११॥✎ 136 1581

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #136 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1581 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: इच्छा-नुसार → इच्छानुसार

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