श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.25

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

एतदेवात्मभू राजन् नारदाय विपृच्छते।

वेदगर्भोऽभ्यधात् साक्षाद्३ यदाह हरिरात्मनः॥ २५✎ 1942

etadevātmabhū rājan nāradāya vipṛcchate|

vedagarbho'bhyadhāt sākṣād yadāha harirātmanaḥ|| 25

अर्थ

परीक्षित्! वेदगर्भ स्वयम्भू ब्रह्माने नारदके प्रश्न करनेपर यही बात कही थी, जिसका स्वयं भगवान् नारायणने उन्हें उपदेश किया था (और वही मैं तुमसे कह रहा हूँ)॥ २५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—सर्वं यदाह हरिरीश्‍वरः।

    (मुद्रित पृष्ठ 198)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1942 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): साक्षात् → साक्षाद्

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