श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रियः पतिर्यज्ञपतिः प्रजापति-

र्धियां पतिर्लोकपतिर्धरापतिः।

पतिर्गतिश्चान्धकवृष्णिसात्वतां

प्रसीदतां मे भगवान् सतां पतिः॥ २०

śriyaḥ patiryajñapatiḥ prajāpati-

rdhiyāṃ patirlokapatirdharāpatiḥ|

patirgatiścāndhakavṛṣṇisātvatāṃ

prasīdatāṃ me bhagavān satāṃ patiḥ|| 20

अर्थ

जो समस्त सम्पत्तियोंकी स्वामिनी लक्ष्मीदेवीके पति हैं, समस्त यज्ञोंके भोक्ता एवं फलदाता हैं, प्रजाके रक्षक हैं, सबके अन्तर्यामी और समस्त लोकोंके पालनकर्ता हैं तथा पृथ्वीदेवीके स्वामी हैं, जिन्होंने यदुवंशमें प्रकट होकर अन्धक, वृष्णि एवं यदुवंशके लोगोंकी रक्षा की है तथा जो उन लोगोंके एकमात्र आश्रय रहे हैं—वे भक्तवत्सल, संतजनोंके सर्वस्व श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्‍न हों॥ २०॥✎ 134 135

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #134 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #135 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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