॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.4.14
नमो नमस्तेऽस्त्वृषभाय सात्वतां
विदूरकाष्ठाय मुहुः कुयोगिनाम्।
निरस्तसाम्यातिशयेन राधसा
स्वधामनि ब्रह्मणि रंस्यते नमः॥ १४
namo namaste'stvṛṣabhāya sātvatāṃ
vidūrakāṣṭhāya muhuḥ kuyoginām|
nirastasāmyātiśayena rādhasā
svadhāmani brahmaṇi raṃsyate namaḥ|| 14
अर्थ
जो बड़े ही भक्तवत्सल हैं और हठपूर्वक भक्तिहीन साधन करनेवाले लोग जिनकी छाया भी नहीं छू सकते; जिनके समान भी किसीका ऐश्वर्य नहीं है, फिर उससे अधिक तो हो ही कैसे सकता है तथा ऐसे ऐश्वर्यसे युक्त होकर जो निरन्तर ब्रह्मस्वरूप अपने धाममें विहार करते रहते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ १४॥✎ 134 135