श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.3.4

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अन्‍नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान्।

विश्वान्देवान् राज्यकामः साध्यान्संसाधको विशाम्॥ ४

annādyakāmastvaditiṃ svargakāmo'diteḥ sutān|

viśvāndevān rājyakāmaḥ sādhyānsaṃsādhako viśām|| 4

अर्थ

जिसे बहुत अन्‍न प्राप्त करनेकी इच्छा हो वह अदितिका; जिसे स्वर्गकी कामना हो वह अदितिके पुत्र देवताओंका, जिसे राज्यकी अभिलाषा हो वह विश्वेदेवोंका और जो प्रजाको अपने अनुकूल बनानेकी इच्छा रखता हो उसे साध्य देवताओंका आराधन करना चाहिये॥ ४॥

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