श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.2.14

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यावन्‍न जायेत परावरेऽस्मिन्

विश्वेश्‍वरे द्रष्टरि भक्तियोगः।

तावत् स्थवीयः पुरुषस्य रूपं

क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत॥ १४

yāvanna jāyeta parāvare'smin

viśveśvare draṣṭari bhaktiyogaḥ|

tāvat sthavīyaḥ puruṣasya rūpaṃ

kriyāvasāne prayataḥ smareta|| 14

अर्थ

ये विश्वेश्‍वर भगवान् दृश्य नहीं, द्रष्टा हैं। सगुण, निर्गुण—सब कुछ इन्हींका स्वरूप है। जबतक इनमें अनन्य प्रेममय भक्तियोग न हो जाय तबतक साधकको नित्य-नैमित्तिक कर्मोंके बाद एकाग्रतासे भगवान्‌के उपर्युक्त स्थूलरूपका ही चिन्तन करना चाहिये॥ १४॥

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