वे भगवान् जगत्के धारण-पोषणके लिये धर्ममय विष्णुरूप स्वीकार करके देवता, मनुष्य और पशु, पक्षी आदि रूपोंमें अवतार लेते हैं तथा विश्वका पालन-पोषण करते हैं॥ ४२॥
स एवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक्।
पुष्णाति स्थापयन् विश्वं तिर्यङ्नरसुरात्मभिः॥ ४२
वे भगवान् जगत्के धारण-पोषणके लिये धर्ममय विष्णुरूप स्वीकार करके देवता, मनुष्य और पशु, पक्षी आदि रूपोंमें अवतार लेते हैं तथा विश्वका पालन-पोषण करते हैं॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 233) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/42/