श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.38

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

किन्‍नराप्सरसो नागान् सर्पान् किम्पुरुषोरगान्।

मातॄ १ रक्षःपिशाचांश्‍च प्रेतभूतविनायकान्॥ ३८

kinnarāpsaraso nāgān sarpān kimpuruṣoragān|

mātṝ rakṣaḥpiśācāṃśca pretabhūtavināyakān|| 38

अर्थ

परीक्षित्! प्रजापति, मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, यक्ष, किन्‍नर,अप्सराएँ, नाग, सर्प, किम्पुरुष, उरग, मातृकाएँ, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, यातुधान, ग्रह, पक्षी, मृग, पशु, वृक्ष, पर्वत, सरीसृप इत्यादि जितने भी संसारमें नाम-रूप हैं, सब भगवान्‌के ही हैं॥ ३७—३९॥

यह व्याख्या श्लोक 2.10.37 से 2.10.39 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मातृरक्षः०।

    (मुद्रित पृष्ठ 232)

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