श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.27

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

द्वे जानुनी सुतलं विश्‍वमूर्तेरूरुद्वयं वितलं चातलं च।✎ 1529

महीतलं तज्जघनं महीपते नभस्तलं नाभिसरो गृणन्ति॥ २७

dve jānunī sutalaṃ viśvamūrterūrudvayaṃ vitalaṃ cātalaṃ ca|

mahītalaṃ tajjaghanaṃ mahīpate nabhastalaṃ nābhisaro gṛṇanti|| 27

अर्थ

विश्‍व-मूर्तिभगवान्‌के दोनों घुटने सुतल हैं, जाँघें वितल और अतल हैं, पेड़ू भूतल है और परीक्षित्! उनके नाभिरूप सरोवरको ही आकाश कहते हैं॥ २७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1529 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विश्‍वमूर्ते-रूरुद्वयं → विश्‍वमूर्तेरूरुद्वयं

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें