विश्व-मूर्तिभगवान्के दोनों घुटने सुतल हैं, जाँघें वितल और अतल हैं, पेड़ू भूतल है और परीक्षित्! उनके नाभिरूप सरोवरको ही आकाश कहते हैं॥ २७॥
द्वे जानुनी सुतलं विश्वमूर्तेरूरुद्वयं वितलं चातलं च।
महीतलं तज्जघनं महीपते नभस्तलं नाभिसरो गृणन्ति॥ २७
विश्व-मूर्तिभगवान्के दोनों घुटने सुतल हैं, जाँघें वितल और अतल हैं, पेड़ू भूतल है और परीक्षित्! उनके नाभिरूप सरोवरको ही आकाश कहते हैं॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 184) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/1/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)