॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.9.4
तां स्तन्यकाम आसाद्य मथ्नन्तीं जननीं हरिः।
गृहीत्वा दधिमन्थानं न्यषेधत् प्रीतिमावहन्॥ ४
tāṃ stanyakāma āsādya mathnantīṃ jananīṃ hariḥ|
gṛhītvā dadhimanthānaṃ nyaṣedhat prītimāvahan|| 4
अर्थ
उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण स्तन पीनेके लिये दही मथती हुई अपनी माताके पास आये। उन्होंने अपनी माताके हृदयमें प्रेम और आनन्दको और भी बढ़ाते हुए दहीकी मथानी पकड़ ली तथा उन्हें मथनेसे रोक दिया†॥ ४॥
टिप्पणियाँ
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हृदयमें लीलाकी सुखस्मृति, हाथोंसे दधिमन्थन और मुखसे लीलागान—इस प्रकार मन, तन, वचन तीनोंका श्रीकृष्णके साथ एकतान संयोग होते ही श्रीकृष्ण जगकर ‘मा-मा’ पुकारने लगे। अबतक भगवान् श्रीकृष्ण सोये हुए-से थे। माकी स्नेह-साधनाने उन्हें जगा दिया। वे निर्गुणसे सगुण हुए, अचलसे चल हुए, निष्कामसे सकाम हुए; स्नेहके भूखे-प्यासे माके पास आये। क्या ही सुन्दर नाम है—‘स्तन्यकाम’! मन्थन करते समय आये, बैठी-ठालीके पास नहीं।
सर्वत्र भगवान् साधनकी प्रेरणा देते हैं, अपनी ओर आकृष्ट करते हैं; परन्तु मथानी पकड़कर मैयाको रोक लिया। ‘मा! अब तेरी साधना पूर्ण हो गयी। पिष्ट-पेषण करनेसे क्या लाभ? अब मैं तेरी साधनाका इससे अधिक भार नहीं सह सकता।’ मा प्रेमसे दब गयी—निहाल हो गयी—मेरा लाला मुझे इतना चाहता है।