॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.7.32
किं नस्तपश्चीर्णमधोक्षजार्चनं
पूर्तेष्टदत्तमुत भूतसौहृदम्।
यत्संपरेतः पुनरेव बालको
दिष्ट्या स्वबन्धून् प्रणयन्नुपस्थितः॥ ३२
kiṃ nastapaścīrṇamadhokṣajārcanaṃ
pūrteṣṭadattamuta bhūtasauhṛdam|
yatsaṃparetaḥ punareva bālako
diṣṭyā svabandhūn praṇayannupasthitaḥ|| 32
अर्थ
हमने ऐसा कौन-सा तप, भगवान्की पूजा, प्याऊ-पौसला, कूआँ-बावली, बाग-बगीचे आदि पूर्त, यज्ञ, दान अथवा जीवोंकी भलाई की थी, जिसके फलसे हमारा यह बालक मरकर भी अपने स्वजनोंको सुखी करनेके लिये फिर लौट आया? अवश्य ही यह बड़े सौभाग्यकी बात है’॥ ३२॥