श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यच्छृण्वतोऽपैत्यरतिर्वितृष्णा

सत्त्वं च शुद्ध्यत्यचिरेण पुंसः।

भक्तिर्हरौ तत्पुरुषे च सख्यं

तदेव हारं वद मन्यसे चेत्॥ २

yacchṛṇvato'paityaratirvitṛṣṇā

sattvaṃ ca śuddhyatyacireṇa puṃsaḥ|

bhaktirharau tatpuruṣe ca sakhyaṃ

tadeva hāraṃ vada manyase cet|| 2

अर्थ

उनके श्रवणमात्रसे भगवत्-सम्बन्धी कथासे अरुचि और विविध विषयोंकी तृष्णा भाग जाती है। मनुष्यका अन्तःकरण शीघ्र-से-शीघ्र शुद्ध हो जाता है। भगवान्‌के चरणोंमें भक्ति और उनके भक्तजनोंसे प्रेम भी प्राप्त हो जाता है। यदि आप मुझे उनके श्रवणका अधिकारी समझते हों, तो भगवान्‌की उन्हीं मनोहर लीलाओंका वर्णन कीजिये॥ २॥✎ 883

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #883 शब्दोंके बीचका स्थान: सर्वशक्तिमान्भगवान् → सर्वशक्तिमान् भगवान्

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें