श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

बालग्रहस्तत्र विचिन्वती शिशून्

यदृच्छया नन्दगृहेऽसदन्तकम्।

बालं प्रतिच्छन्‍ननिजोरुतेजसं

ददर्श तल्पेऽग्‍निमिवाहितं भसि॥ ७

bālagrahastatra vicinvatī śiśūn

yadṛcchayā nandagṛhe'sadantakam|

bālaṃ praticchannanijorutejasaṃ

dadarśa talpe'gnimivāhitaṃ bhasi|| 7

अर्थ

पूतना बालकोंके लिये ग्रहके समान थी। वह इधर-उधर बालकोंको ढूँढ़ती हुई अनायास ही नन्दबाबाके घरमें घुस गयी। वहाँ उसने देखा कि बालक श्रीकृष्ण शय्यापर सोये हुए हैं। परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण दुष्टोंके काल हैं। परन्तु जैसे आग राखकी ढेरीमें अपनेको छिपाये हुए हो, वैसे ही उस समय उन्होंने अपने प्रचण्ड तेजको छिपा रखा था॥ ७॥✎ 1655

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1655 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नन्द-बाबाके → नन्दबाबाके

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