॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.6.18
बालं च तस्या उरसि क्रीडन्तमकुतोभयम्।
गोप्यस्तूर्णं समभ्येत्य जगृहुर्जातसम्भ्रमाः॥ १८
bālaṃ ca tasyā urasi krīḍantamakutobhayam|
gopyastūrṇaṃ samabhyetya jagṛhurjātasambhramāḥ|| 18
अर्थ
जब गोपियोंने देखा कि बालक श्रीकृष्ण उसकी छातीपर निर्भय होकर खेल रहे हैं,* तब वे बड़ी घबराहट और उतावलीके साथ झटपट वहाँ पहुँच गयीं तथा श्रीकृष्णको उठा लिया॥ १८॥
टिप्पणियाँ
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पूतनाके वक्षःस्थलपर क्रीडा करते हुए मानो मन-ही-मन कह रहे थे—
स्तनन्धयस्य स्तन एव जीविका दत्तस्त्वया स स्वयमानने मम।
मया च पीतो म्रियते यदि त्वया किं वा ममागः स्वयमेव कथ्यताम्॥
‘मैं दुधमुँहाँ शिशु हूँ, स्तनपान ही मेरी जीविका है। तुमने स्वयं अपना स्तन मेरे मुँहमें दे दिया और मैंने पिया। इससे यदि तुम मर जाती हो तो स्वयं तुम्हीं बताओ इसमें मेरा क्या अपराध है।’
राजा बलिकी कन्या थी रत्नमाला। यज्ञशालामें वामन भगवान्को देखकर उसके हृदयमें पुत्रस्नेहका भाव उदय हो आया। वह मन-ही-मन अभिलाषा करने लगी कि यदि मुझे ऐसा बालक हो और मैं उसे स्तन पिलाऊँ तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी। वामन भगवान्ने अपने भक्त बलिकी पुत्रीके इस मनोरथका मन-ही-मन अनुमोदन किया। वही द्वापरमें पूतना हुई और श्रीकृष्णके स्पर्शसे उसकी लालसा पूर्ण हुई।