वसुदेवजीको देखते ही नन्दजी सहसा उठकर खड़े हो गये मानो मृतक शरीरमें प्राण आ गया हो। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपने प्रियतम वसुदेवजीको दोनों हाथोंसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया। नन्दबाबा उस समय प्रेमसे विह्वल हो रहे थे॥ २१॥
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय देहः प्राणमिवागतम्।
प्रीतः प्रियतमं दोर्भ्यां सस्वजे प्रेमविह्वलः॥ २१
वसुदेवजीको देखते ही नन्दजी सहसा उठकर खड़े हो गये मानो मृतक शरीरमें प्राण आ गया हो। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपने प्रियतम वसुदेवजीको दोनों हाथोंसे पकड़कर हृदयसे लगा लिया। नन्दबाबा उस समय प्रेमसे विह्वल हो रहे थे॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.5.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 153) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/21/