॥ श्रीहरिः ॥
रोहिणी च महाभागा नन्दगोपाभिनन्दिता।
व्यचरद् दिव्यवासःस्रक्कण्ठाभरणभूषिता॥ १७
rohiṇī ca mahābhāgā nandagopābhinanditā|
vyacarad divyavāsaḥsrakkaṇṭhābharaṇabhūṣitā|| 17
अर्थ
नन्दबाबाके अभिनन्दन करनेपर परम सौभाग्यवती रोहिणीजी दिव्य वस्त्र, माला और गलेके भाँति-भाँतिके गहनोंसे सुसज्जित होकर गृहस्वामिनीकी भाँति आने-जानेवाली स्त्रियोंका सत्कार करती हुई विचर रही थीं॥ १७॥
रोहिणी च महाभागा नन्दगोपाभिनन्दिता।
व्यचरद् दिव्यवासःस्रक्कण्ठाभरणभूषिता॥ १७
नन्दबाबाके अभिनन्दन करनेपर परम सौभाग्यवती रोहिणीजी दिव्य वस्त्र, माला और गलेके भाँति-भाँतिके गहनोंसे सुसज्जित होकर गृहस्वामिनीकी भाँति आने-जानेवाली स्त्रियोंका सत्कार करती हुई विचर रही थीं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.5.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 153) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/5/17/