जीव अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरकर जाता है। अपनी करनी-धरनीका, पाप-पुण्यका फल भी अकेला ही भुगतता है॥ २१॥
एकः प्रसूयते जन्तुरेक एव प्रलीयते।
एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम्॥ २१
जीव अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरकर जाता है। अपनी करनी-धरनीका, पाप-पुण्यका फल भी अकेला ही भुगतता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.49.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 443) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/49/21/