श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.49.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 49 · अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

यास्यन् राजानमभ्येत्य विषमं पुत्रलालसम्।

अवदत् सुहृदां मध्ये बन्धुभिः सौहृदोदितम्॥ १६

yāsyan rājānamabhyetya viṣamaṃ putralālasam|

avadat suhṛdāṃ madhye bandhubhiḥ sauhṛdoditam|| 16

अर्थ

अक्रूरजी जब मथुरा जाने लगे, तब राजा धृतराष्ट्रके पास आये। अबतक यह स्पष्ट हो गया था कि राजा अपने पुत्रोंका पक्षपात करते हैं और भतीजोंके साथ अपने पुत्रोंका-सा बर्ताव नहीं करते। अब अक्रूरजीने कौरवोंकी भरी सभामें श्रीकृष्ण और बलरामजी आदिका हितैषितासे भरा सन्देश कह सुनाया॥ १६॥✎ 1681

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1681 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कह-कर → कहकर

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