श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

अद्येश नो वसतयः खलु भूरिभागा

यः सर्वदेवपितृभूतनृदेवमूर्तिः।

यत्पादशौचसलिलं त्रिजगत् पुनाति

स त्वं जगद्गुरुरधोक्षज याः प्रविष्टः॥ २५

adyeśa no vasatayaḥ khalu bhūribhāgā

yaḥ sarvadevapitṛbhūtanṛdevamūrtiḥ|

yatpādaśaucasalilaṃ trijagat punāti

sa tvaṃ jagadgururadhokṣaja yāḥ praviṣṭaḥ|| 25

अर्थ

इन्द्रियातीत परमात्मन्! सारे देवता, पितर, भूतगण और राजा आपकी मूर्ति हैं। आपके चरणोंकी धोवन गंगाजी तीनों लोकोंको पवित्र करती हैं। आप सारे जगत‍्के एकमात्र पिता और शिक्षक हैं। वही आज आप हमारे घर पधारे। इसमें सन्देह नहीं कि आज हमारे घर धन्य-धन्य हो गये। उनके सौभाग्यकी सीमा न रही॥ २५॥

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