श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

स तान् नरवरश्रेष्ठानाराद् वीक्ष्य स्वबान्धवान्।

प्रत्युत्थाय प्रमुदितः परिष्वज्याभ्यनन्दत॥ १३

sa tān naravaraśreṣṭhānārād vīkṣya svabāndhavān|

pratyutthāya pramuditaḥ pariṣvajyābhyanandata|| 13

अर्थ

अक्रूरजीने दूरसे ही देख लिया कि हमारे परम बन्धु मनुष्यलोकशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी आदि पधार रहे हैं। वे तुरंत उठकर आगे गये तथा आनन्दसे भरकर उनका अभिनन्दन और आलिंगन किया॥ १३॥✎ 1680

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1680 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भर-कर → भरकर

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