श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.66

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः।

वाचोऽभिधायिनीर्नाम्‍नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु॥ ६६

manaso vṛttayo naḥ syuḥ kṛṣṇapādāmbujāśrayāḥ|

vāco'bhidhāyinīrnāmnāṃ kāyastatprahvaṇādiṣu|| 66

अर्थ

‘उद्धवजी! अब हम यही चाहते हैं कि हमारे मनकी एक-एक वृत्ति, एक-एक संकल्प श्रीकृष्णके चरणकमलोंके ही आश्रित रहे। उन्हींकी सेवाके लिये उठे और उन्हींमें लगी भी रहे। हमारी वाणी नित्य-निरन्तर उन्हींके नामोंका उच्चारण करती रहे और शरीर उन्हींको प्रणाम करने, उन्हींके आज्ञापालन और सेवामें लगा रहे॥ ६६॥✎ 1678 1986

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1678 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आज्ञा-पालन → आज्ञापालन
  • #1986 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उन्हींकी → उन्हींके

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