श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.56

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

सरिद्वनगिरिद्रोणीर्वीक्षन् कुसुमितान् द्रुमान्।

कृष्णं संस्मारयन् रेमे हरिदासो व्रजौकसाम्॥ ५६

saridvanagiridroṇīrvīkṣan kusumitān drumān|

kṛṣṇaṃ saṃsmārayan reme haridāso vrajaukasām|| 56

अर्थ

भगवान्‌के परमप्रेमी भक्त उद्धवजी कभी नदीतटपर जाते, कभी वनोंमें विहरते और कभी गिरिराजकी घाटियोंमें विचरते। कभी रंग-बिरंगे फूलोंसे लदे हुए वृक्षोंमें ही रम जाते और यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने कौन-सी लीला की है, यह पूछ-पूछकर व्रजवासियोंको भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी लीलाके स्मरणमें तन्मय कर देते॥ ५६॥

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