strīṇāṃ ca na tathā cetaḥ sannikṛṣṭe'kṣigocare|| 35
अर्थ
क्योंकि स्त्रियों और अन्यान्य प्रेमियोंका चित्त अपने परदेशी प्रियतममें जितना निश्चल भावसे लगा रहता है, उतना आँखोंके सामने, पास रहनेवाले प्रियतममें नहीं लगता॥ ३५॥✎ 1677
यथा दूरचरे प्रेष्ठे मन आविश्य वर्तते।
स्त्रीणां च न तथा चेतः सन्निकृष्टेऽक्षिगोचरे॥ ३५
क्योंकि स्त्रियों और अन्यान्य प्रेमियोंका चित्त अपने परदेशी प्रियतममें जितना निश्चल भावसे लगा रहता है, उतना आँखोंके सामने, पास रहनेवाले प्रियतममें नहीं लगता॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.47.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 428) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)